बिहार में दूसरे और अंतिम चरण में 11 नवंबर को 20 जिलों की 122 सीटों पर मतदान होना है। देखा जाए तो बिहार की राजनीति का मौजूदा समीकरण पिछले कुछ वर्षों में अप्रत्याशित रूप से बदला है। इस बार बदलाव की धुरी कोई राजनेता, राजनीतिक दल और कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है बल्कि राज्य की महिला मतदाताएं हैं। जिन्हें अब मौन वोटर के बजाय मौन क्रांति के रूप में देखा जा रहा है।
परंपरागत रूप से बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में एक समय था जब महिलाओं की भूमिका केवल रैलियों की भीड़ या घरों तक सीमित मानी जाती थी। परन्तु, बीते एक दशक से अधिक की राजनीति में महिला मतदाताओं का उभार सबसे बड़ा और गुणात्मक परिवर्तन है। बिहार के राजनीति की दिशा महिलाएं तय कर रहीं हैं, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है। बिहार की चुनावी राजनीति का वोटबैंक अब महिला वोटबैंक हो गया है।

क्यों महत्वपूर्ण हैं महिला मतदाता?
बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में मतदाताओं की संख्या अभूतपूर्व है। इस चरण में जहाँ 1.95 करोड़ पुरुष मतदाता अपने मतदान अधिकार का प्रयोग करेंगे, वहीं 1.74 करोड़ महिला मतदाता भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने को तैयार हैं। यह आँकड़ा केवल संख्या नहीं है, यह इस बात का संकेत है कि बिहार की महिलाएँ अब चुनावी राजनीति में एक मजबूत, उभरती और निर्णायक शक्ति के रूप में सामने आ रही हैं। पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिलाओं की इतनी बड़ी संख्या चुनावी प्रचार, रणनीति और परिणाम तीनों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।
‘किंगमेकर’ की भूमिका में महिलायें
बिहार के चुनावी इतिहास को देखें तो पता चलता है कि पिछले एक दशक की राजनीति में महिला मतदाताओं ने पुरूष मतदाताओं से अधिक मतदान किया है। उनकी राजनीतिक भागीदारी पुरुषों की अपेक्षा अधिक रही।

बीते एक दशक से अधिक समय की चुनावी राजनीति में बिहार के विधानसभा चुनाव क्रमशः 2010, 2015 और 2020 के परिणाम बताते हैं कि बिहार की राजनीति महिलाओं के हाथों में रही। 2010 के विधानसभा चुनाव में पहली बार महिला मतदाताओं नें न सिर्फ अधिक मतदान किया बल्कि 162 निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया ।
इसी प्रकार 2015 के विधान सभा चुनाव में 53.32 पुरुषों की तुलना में 60.48% महिलाओं नें मतदान किया । इस साल बिहार के 202 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे रहे जहां महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया। इस चुनाव में महिला मतदाताओं ने पुरुषों की अपेक्षा 7% अधिक मतदान किया और यही सिलसिला 2020 के विधानसभा चुनावों में भी देखा गया जहां 243 में से 167 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा मतदान किया था, खासकर उत्तर बिहार में इन क्षेत्रों में एनडीए को भारी बहुतमत मिला।
2020 के बिहार चुनाव में 59.6 % महिला मतदाताओं ने मतदान किया है, जबकि पुरुष मतदाताओं ने 54.7 फीसद ही मतदान किया । इस बार का मतदान प्रतिशत 4.9 % का अंतर आया । यह ट्रेंड अचानक नहीं आया, बल्कि बीते 15 वर्षों में महिला वोटरों की सक्रियता बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रही है।
लोकसभा चुनाव (2024) में भी बिहार में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में अधिक रहा है। चुनाव आयोग द्वारा जारी अंतिम आँकड़ों के अनुसार, बिहार में कुल मतदान प्रतिशत लगभग 56.96% रहा था। लोकसभा चुनाव में पुरुष मतदाताओं लगभग 53.28% प्रतिशत की तुलना में महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत: लगभग 59.39% रहा ।
इस प्रकार पिछले एक दशक की बिहार की राजनीति ‘जाति-आधारित’ नहीं, बल्कि ‘महिला-आधारित’ हो चुकी है। अब बिहार की राजनीति जाति और धर्म के पुराने समीकरणों से निकलकर विकास और महिला केंद्रित नीतियों की ओर बढ़ रही है।
महिलाओं का लगातार बढ़ता मतदान प्रतिशत
बिहार की राजनीति में दूसरा सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं का लगातार बढ़ता मतदान प्रतिशत है, पिछले तीन विधानसभा चुनावों में महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा है।

2010 बिहार विधानसभा चुनाव यह वह साल था जब पहली बार महिला वोटिंग पुरुषों से आगे निकली थी।) जिसमें महिला मतदान प्रतिशत: 54.49% जबकि पुरुष मतदान प्रतिशत: 51.12% रहा । 2015 विधानसभा चुनाव महिला मतदान प्रतिशत: 60.48% पुरुष मतदान प्रतिशत: 53.32%अंतर: लगभग 7.16% अधिक। इसी प्रकार 2020 विधानसभा चुनाव महिला मतदान प्रतिशत: 59.69% पुरुष मतदान प्रतिशत: 54.45%(अंतर: लगभग 5.24% अधिक) रहा ।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद अंतिम मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या लगभग 7.42 करोड़ हो गई। जिसमें 3.92 करोड़ पुरुष और 3.49 करोड़ महिला महिलदाता हैं, जबकि थर्ड जेंडर मतदाता की संख्या 1,725 ।
निर्वाचन आयोग के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार महिला मतदाताओं की संख्या (3.49 करोड़) भले ही पुरुष मतदाताओं (3.92 करोड़) की अपेक्षा कम हो परंतु महिलाओं ने पिछले चुनावों में मतदान प्रतिशत के मामले में लगातार पुरुषों को पीछे छोड़ा है । यह संख्या इस बात की पुष्टि करती है कि महिला मतदाता बिहार की राजनीति में एक बड़ा और निर्णायक समूह बनी हुई हैं, जिस पर सभी राजनीतिक दलों का ध्यान केंद्रित है।
बिहार की राजनीति महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी और सहभागिता नें राजनीतिक मुद्दों और नीतियों को प्रभावित करने का काम किया है। महिला केंद्रित नीतियाँ और हाल ही में विभिन्न पार्टियों की सरकारों द्वारा चलाई जा रही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना जिसमें सीधे महिलाओं के खातों में पैसे भेजे जाते हैं। यह दिखाता है कि महिला वोटर अब हर पार्टी के एजेंडा के केंद्र में हैं। बिहार की राजनीति में महिलाएँ हमेशा एक ‘साइलेंट वोटर’ रही हैं, लेकिन अब वे राजनीतिक पार्टियों के एजेंडा को निर्धारित कर रही हैं।
इस प्रकार बिहार में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से उनका राजनीतिक महत्व तो बढ़ा ही है, इसके साथ अब महिलएं राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गई हैं। महिलाएँ अब किसी पार्टी की ‘बंधुआ वोटर’ नहीं, बल्कि ‘परिणाम निर्धारक’ हैं। बिहार की राजनीति में ‘आधी आबादी’ अब सिर्फ़ संख्या नहीं, बल्कि ‘पूरी ताकत’ है। बिहार के दूसरे चरण में महिलाएँ ही बिहार के सत्ता का ‘नया इतिहास’ लिख सकती हैं।
(लेखक पवन कुमार उपाध्याय एमजीएएचवी, वर्धा (महाराष्ट्र) के शोधार्थी, स्त्री अध्ययन विभाग हैं।)